Saturday, October 21, 2017

नर पर नारी भारी- *हास्य कविता*

*हास्य कविता*



अक्ल बाटने लगे विधाता,

             लंबी लगी कतारी ।

सभी आदमी खड़े हुए थे,

            कहीं नहीं थी नारी ।

सभी नारियाँ कहाँ रह गई,

          था ये अचरज भारी ।

पता चला ब्यूटी पार्लर में,

          पहुँच गई थी सारी।

मेकअप की थी गहन प्रक्रिया,

           एक एक पर भारी ।

बैठी थीं कुछ इंतजार में,

          कब आएगी बारी ।

उधर विधाता ने पुरूषों में,

         अक्ल बाँट दी सारी ।

ब्यूटी पार्लर से फुर्सत पाकर,

        जब पहुँची सब नारी ।

बोर्ड लगा था स्टॉक ख़त्म है,

        नहीं अक्ल अब बाकी ।

रोने लगी सभी महिलाएं ,

        नींद खुली ब्रह्मा की ।

पूछा कैसा शोर हो रहा है,

         ब्रह्मलोक के द्वारे ?

पता चला कि स्टॉक अक्ल का

         पुरुष ले गए सारे ।

ब्रह्मा जी ने कहा देवियों ,

          बहुत देर कर दी है ।

जितनी भी थी अक्ल वो मैंने,

          पुरुषों में भर दी है ।

लगी चीखने महिलाये ,

         ये कैसा न्याय तुम्हारा?

कुछ भी करो हमें तो चाहिए,

          आधा भाग हमारा ।

पुरुषो में शारीरिक बल है,

          हम ठहरी अबलाएं ।

अक्ल हमारे लिए जरुरी ,

         निज रक्षा कर पाएं ।

सोचकर दाढ़ी सहलाकर ,

         तब बोले ब्रह्मा जी ।

एक वरदान तुम्हे देता हूँ ,

         अब हो जाओ राजी ।

थोड़ी सी भी हँसी तुम्हारी ,

         रहे पुरुष पर भारी ।

कितना भी वह अक्लमंद हो,

         अक्ल जायेगी मारी ।

एक औरत ने तर्क दिया,

        मुश्किल बहुत होती है।

हंसने से ज्यादा महिलाये,

        जीवन भर रोती है ।

ब्रह्मा बोले यही कार्य तब,

        रोना भी कर देगा ।

औरत का रोना भी नर की,

        अक्ल हर लेगा ।

एक अधेड़ बोली बाबा,

       हंसना रोना नहीं आता ।

झगड़े में है सिद्धहस्त हम,

       खूब झगड़ना भाता ।

ब्रह्मा बोले चलो मान ली,

       यह भी बात तुम्हारी ।

झगड़े के आगे भी नर की,

       अक्ल जायेगी मारी ।

ब्रह्मा बोले सुनो ध्यान से,

       अंतिम वचन हमारा ।

तीन शस्त्र अब तुम्हे दिए,

       पूरा न्याय हमारा ।

इन अचूक शस्त्रों में भी,

       जो मानव नहीं फंसेगा ।निश्चित समझो, 

       उसका घर नहीं बसेगा ।

कहे कवि मित्र ध्यान से,

       सुन लो बात हमारी ।

बिना अक्ल के भी होती है,

       नर पर नारी भारी।

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